सबदु गुरु सुरति धुनि चेला

यह शब्द “गुरु“ लोगों के मन में जीवित लोगों की छवियों को ले आता है। कभी-कभी मन की आंखें एक गंभीर व्यक्ति के चारों ओर ध्यान लगाए बैठे हुए लोगों के समूह की ओर चली जाती हैं। आजकल यह छवि महिलाओं के साथ हुए यौन दुर्व्यवहारों या उन्हें वेश्यावृत्ति के धन्धे में ढकले दिए जाने के कारण विकृत हो चुकी है। तथापि, गुरु को एक ऐसे रूप के रूप में देखा जाता है, जो आध्यात्मिक सन्तुष्टि पाने वालों की दुविधा या भ्रम को दूर करता है, जिसे स्पष्ट रूप से एक भक्त या सत्य के खोजी द्वारा पश्चिम के भौतिकवाद या पूर्व के सन्यासवाद या पलायनवाद से प्राप्त नहीं किया जा सकता है।

भौतिकवाद और पलायनवाद की इस अंधेरी छाया में, एक गुरु आशा की छवि के साथ या आज के व्यक्ति के लिए आशा के रूप में दिखाई देता हुआ प्रतीत होता है। भारतीय परम्परा में, गुरु ने अब तक के मानवीय जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वास्तव में, इस अर्थ में भारतीय परम्परा को गुरु-पद परम्परा कहा जा सकता है। गुरु नानक, जो भारतीय परंपरा में आए थे, ने सदैव जोर देकर कहा कि परमेश्वर, अर्थात् अकाल पुरख; सर्वोच्च परम अज्ञात् स्रोत अर्थात् वाहेगुरु ने अपनी अनुग्रह में होकर स्वयं को शब्द के द्वारा मनुष्य के ऊपर प्रकट किया है। इसलिए, वह ईश्वर को अनन्त गुरु, और स्वयं को केवल उसका सेवक ही मानते हैं, “शब्द (मेरा) गुरु है, मेरी तवज्जो का टिकाव (उस गुरु का) सिख हैं”  (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 943)।[1] परिणामस्वरूप, उनकी सारी शिक्षाएं ऐसे ईश्वर पर केन्द्रित हैं, जिसे “जगत गुरु” (विश्व गुरु), “सत नाम” (सच्चा नाम) या “वाहे गुरु” (सर्वशक्तिमान ईश्वर), या सभी मानव जाति के गुरु के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार, इस अर्थ में शब्द गुरु है और यह गुरु शब्द है।

कभी-कभी, गुरु-पद की हिन्दू परम्परा में, गुरु को परमेश्वर से भी अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उसके बिना कोई भी ज्ञान की प्राप्त नहीं कर सकता है।[2]  यद्यपि, ऐसे तत्व (जैसे ब्राह्मण, माता, शिक्षक और अन्य) गुरु नानक की शिक्षाओं में लगभग पूरी तरह से अनुपस्थित हैं। वे “प्रसाद” (ईश्वरीय अनुग्रह) की अवधारणा ले कर आए, जो गुरु द्वारा दिया जाता है; इसलिए, यह गुरु-प्रसाद, “अकाल-पुरख एक है, जिसका नाम ‘अस्तित्व वाला’ है, जो सृष्टि का रचनहार है, (करता है) जो सब में व्यापक है, जो भय से रहित है (निर्भय), बैर से रहित है (निर्वेर), जिसका स्वरूप काल से परे है, (भाव, जिसका शरीर नाश-रहित है), जो यौनियों में नहीं आता,जिसका प्रकाश अपने आप से हुआ है और जो सतगुरु की कृपा से मिलता है”  (गुरु ग्रंथ. पृष्ठ. 1)।[3]  इसलिए, सिख धर्म में, गुरु द्वारा एक व्यक्ति को सांसारिक जीवन जीने के लिए दी जाने वाली शिक्षा से कहीं अधिक लेना-देना परमेश्वर (अकाल पुरख), अनुग्रह (मेहर, नदरि, कृपा), सिद्धि (प्राप्ति), परम सुख (सर्वोच्च आनन्द) के साथ है।

सिख धर्म में आगे यह कहा गया है कि, “परमेश्वर” एक साधक या भक्त को अपने बारे में अपने गुरु या उसके लिए आध्यात्मिक मार्गदर्शक के रूप में जानकारी देने में सहायता करता है और उसे केवल गुरु की कृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है। “सच्चे गुरु के बिना, कोई भी प्रभु को प्राप्त नहीं करता है; सच्चे गुरु के बिना, किसी ने भी प्रभु को प्राप्त नहीं किया है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 466)।[4]  गुरु ग्रंथ का मानना ​​है कि “परमेश्वर” स्वयं ही सच्चा गुरु (सतगुरु) है। इसलिए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर (वाहे गुरु) के अतिरिक्त कोई भी गुरु उसके विरोध में या उसके सहायक के रूप में अस्तित्व में नहीं है। इसलिए, मोक्ष के खजाने को प्राप्त करने के लिए, सिखों के लिए शब्द-गुरु को पढ़ना और सुनना आवश्यक है: “गुरु का शब्द अमृत है; इसे पीने से प्यास बुझती है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 35)।[5]

गुरु ग्रंथ आगे यह विचार प्रदान करता है कि परमेश्वर उन लोगों के निकट आता है, जो सतगुरु के (सच्चे स्वामी) अनुग्रह या कृपा को स्वीकार करते हैं और गुरु से इस अनुग्रह को प्राप्त करते हैं, “अब परमात्मा मेरा (आसरा बन गया है), मैं परमात्मा का (ही) सेवक (बन चुका) हूँ। गुरु ने मुझे सदा स्थिर रहने वाला महिमा का शब्द बख्श दिया है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ 100)।[6]  इसलिए, एक भक्त को यह सलाह दी जाती है कि उसे सतगुरु से मिलना चाहिए, जो अकेले ही उसे माया के लगाव या मोह को हटाने की शक्ति रखता है, “अगर (ऐसे) गुरु से मनुष्य की मुलाकात हो जाए, जो उसके अंदर से मोह दूर कर दे, तो मनुष्य मुक्त (भाव, मायावी बंधनों से आजाद) हो जाता है” (गुरु ग्रंथ. पृष्ठ. 466)।[7]  क्योंकि जब तक एक भक्त सतगुरु से नहीं मिलता, वह परमेश्वर के आश्चर्य से अभिभूत नहीं होता, “वह जो सच्चे गुरु की शिक्षाओं को स्वीकार करता है, वह सच्चे गुरु में मग्न हो जाता है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 797)।[8]

परिणामस्वरूप, जो लोग शब्द गुरु के बिना हैं, वह पागल, मूर्ख, मृत हैं, “वह सदा जगत-मूल प्रभु की ही महिमा करता है। गुरु पीर के शब्द को (हृदय में टिका के) वह गहरे जिगरे वाला बन जाता है। पर गुरु शब्द से टूट के जगत (माया के मोह में) कमला (हुआ फिरता) है”  (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 635) [9]  और इसका मुख्य कारण यह है कि वे एक ऐसे संसार में हैं, जो दुःख से भरा हुआ है, “हे नानक! सारा संसार दु∶खी है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 954)।[10]  परन्तु, यह शब्द ही है, जो सभी दु∶खों और परेशानियों को दूर कर सकता है, “हे संत जनो! परमात्मा की महिमा की वाणी जिस मनुष्य के अंदर आ बसी, उसने अपनी सारी चिन्ता दूर कर ली” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 628)।[11]

उपरोक्त चर्चा के प्रकाश में, एक साधक को पता चल जाता है कि सर्वोच्च अज्ञात् स्रोत ‘तत्व’ स्वरूप परमेश्वर ने अपने “शब्द” के माध्यम से मनुष्य के ऊपर स्वयं को प्रकट किया है। यह शब्द न केवल सर्वशक्तिमान परमेश्वर है, अपितु सतगुरु (सच्चा साहिब) भी है। वह अपना “गुर-प्रसाद” (ईश्वरीय अनुग्रह) देता है, ताकि एक साधक को मोक्ष की प्राप्ति हो, आनन्द की प्राप्ति हो। ईश्वरीय कृपा उन सभों के लिए उपलब्ध है, जो उसके निकट चले आते हैं। जो लोग इसे प्राप्त करते हैं, वे उसकी महिमा में लीन हो जाते हैं।

यह समझ हमें कुछ प्रश्नों को पूछने के लिए प्रेरित करती है: वह सतगुरु कहाँ है? मैं उसे कैसे पा सकता हूँ? उसकी कृपा प्राप्त करने के लिए मैं क्या करूँ? क्या गुरु-प्रसाद मेरे लिए भी उपलब्ध है, मैं कैसा व्यक्ति हूँ, जिसने स्वयं को मोह माया के इस संसार में गवाँ दिया दिया है। मैं उसके निकट कैसे पहुँच सकता हूँ? इसका मार्ग क्या है? और इस तरह के और अधिक सम्बन्धित प्रश्न हैं। परन्तु, हम इन प्रश्नों के उत्तरों को ग्रंथ बाइबल में स्पष्ट रूप से पाते हैं।

ग्रंथ बाइबल कहता है कि परमेश्वर मानवीय समझ से परे है। कोई भी यह नहीं समझ सकता है कि वह कैसे काम करता है, वह कैसे चलता है, कैसे वह ब्रह्मांड के विषयों का संचालन करता है, “आहा! परमेश्‍वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गंभीर है! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं!” (रोमियों 11∶33), क्योंकि एक साधक समय और स्थान की सीमाओं के भीतर रहता है, उसे इस तथ्य को स्वीकार करने के लिए कहा जाता है कि, “परमेश्वर सर्वशक्तिमान यहोवा महान् और अति स्तुति के योग्य है, और उसकी बड़ाई अगम है” (भजन संहिता 145∶3)।

तौभी, उसकी कुछ झलकें उन खोजियों को मिल जाती हैं, जो उसे ढूंढते हैं, “किसने महासागर को चुल्लू से मापा और किसके बित्ते से आकाश का नाप हुआ, किसने पृथ्वी की मिट्टी को नपुए में भरा और पहाड़ों को तराजू में और पहाड़ियों को काँटे में तौला है? किसने यहोवा परमेश्वर के आत्मा को मार्ग बताया या उसका मन्त्री होकर उसको ज्ञान सिखाया है? उसने किससे सम्मति ली और किसने उसे समझाकर न्याय का पथ बता दिया और ज्ञान सिखाकर बुद्धि का मार्ग जता दिया है?“ (यशायाह 40∶12-14)। सबसे दु∶खद बात यह है कि मानवीय मन इस परमेश्वर (वाहे गुरु) और उसकी सर्वशक्तिमानता, उसकी महानता, उसकी महिमा और स्वयं उस ही को समझने की कोशिश कर रहा है। “क्या तू परमेश्‍वर का गूढ़ भेद पा सकता है? क्या तू सर्वशक्‍तिमान का मर्म पूरी रीति से जाँच सकता है?” (अय्यूब 11∶7), और यदि कोई उसे पा सकता है, तो इसका उत्तर नहीं में है।

तो फिर मार्ग क्या है? इसका उत्तर एक बार फिर से ग्रंथ बाइबल में मिलता है, “उसने सब कुछ ऐसा बनाया कि अपने अपने समय पर वे सुन्दर होते हैं; फिर उसने मनुष्यों के मन में अनादि–अनन्त काल का ज्ञान उत्पन्न किया है” (सभोपदेशक 3:11)। यह अनन्त काल या दूसरे शब्दों में, सर्वशाक्तिमान परमेश्वर का यह ईश्वरीय तत्व एक साधक को सतगुरु (सच्चा गुरु) से मिलने में सक्षम बनाता है, जो शब्द के रूप में उसके पास आया है, “आदि में शब्द था, और शब्द परमेश्‍वर के साथ था, और शब्द परमेश्‍वर था। यही आदि में परमेश्‍वर के साथ था। सब कुछ उसी के द्वारा उत्पन्न हुआ, और जो कुछ उत्पन्न हुआ है उसमें से कोई भी वस्तु उसके बिना उत्पन्न नहीं हुई” (यूहन्ना 1:1-3)।

ग्रंथ बाइबल कहता है कि यह शब्द सतगुरु यीशु मसीह के अलावा और कोई नहीं है, “तौभी हमारे लिये तो एक ही परमेश्‍वर है : अर्थात् पिता जिसकी ओर से सब वस्तुएँ हैं, और हम उसी के लिये हैं। और एक ही प्रभु है, अर्थात् सतगुरु यीशु मसीह जिसके द्वारा सब वस्तुएँ हुईं, और हम भी उसी के द्वारा हैं” (1 कुरिन्थियों 8:6)। उपरोक्त वचन गुरु ग्रंथ के एक श्लोक के जैसा ही है, “एक ईश्वर हमारा पिता है; हम एक ईश्वर की सन्तान हैं। वह तू हमारा गुरु है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 611)।[12]  जब यह शब्द अपने वचन को बोलता है, तो मानवीय मन में रहने वाला ईश्वरीय तत्व उसे पहचानता है, “और भेड़ें उसका शब्द सुनती हैं, और वह अपनी भेड़ों को नाम ले लेकर बुलाता है और बाहर ले जाता है। जब वह अपनी सब भेड़ों को बाहर निकाल चुकता है, तो उनके आगे आगे चलता है, और भेड़ें उसके पीछे पीछे हो लेती हैं, क्योंकि वे उसका शब्द पहचानती हैं” (यूहन्ना 10:3-4), और वह उन्हें उसके पीछे चलने का प्रस्ताव देता है। परिणामस्वरूप, एक साधक या भक्त को परम आनन्द या सुख की प्राप्ति का लाभ मिलता है, “वह उनकी आँखों से सब आँसू पोंछ डालेगा; और इसके बाद मृत्यु न रहेगी, और न शोक, न विलाप, न पीड़ा रहेगी; पहली बातें जाती रहीं” (प्रकाशितवाक्य 21:4)।

सतगुरु यीशु मसीह के साथ होने वाली मुलाकात एक साधक की परिस्थिति को पूरी तरह से बदल देती है। यह ऐसा है कि मानो कोई एक भक्त या साधक अपनी गहरी नींद से जाग उठा हो, “परन्तु मैं तो धर्मी होकर तेरे मुख का दर्शन करूँगा जब मैं जागूँगा तब तेरे स्वरूप से सन्तुष्‍ट हूँगा”  (भजन संहिता 17:15)। इसके अतिरिक्त, जब शब्द स्वरूप सतगुरु यीशु मसीह अपने लोगों के बीच रहने के लिए आया, तो वह अपने गुरु-प्रसाद (ईश्वरीय अनुग्रह) को साथ लेकर आया, “इसलिये कि व्यवस्था तो मूसा (मानवीय मध्यस्थ) के द्वारा दी गई, परन्तु अनुग्रह और सच्‍चाई यीशु मसीह के द्वारा पहुँची” (यूहन्ना 1:17) और, दिलचस्प बात तो यह है कि यह अनुग्रह उदारता से दिया जाता है, क्योंकि कोई भी मनुष्य इसे कमा नहीं सकता है, और कोई भी इसके योग्य नहीं हैं और कोई भी इसे तब तक नहीं पा सकता है, जब तक कि एक कृपालु परमेश्वर अपनी कृपा में होकर इसे हमें न दे, “मैं तुमसे सच सच कहता हूँ, जो मेरा [सतगुरु यीशु मसीह] वचन सुनकर मेरे भेजने वाले पर विश्‍वास करता है, अनन्त जीवन उसका है; और उस पर दण्ड की आज्ञा नहीं होती परन्तु वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है” (यूहन्ना 5:24)।

इसलिए, यह निमंत्रण सतगुरु यीशु मसीह द्वारा दिया गया है, जो कि एक साधक के लिए परमेश्वर के पास ले आने वाला शब्द है, “परमेश्‍वर के निकट आओ तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा”  (याकूब 4:8) और इसके लिए सबसे सरल और सीधे “विश्वास के मार्ग” का पालन किए जाने का सुझाव दिया गया है, “और विश्‍वास के बिना उसे प्रसन्न करना अनहोना है; क्योंकि परमेश्‍वर के पास आनेवाले को विश्‍वास करना चाहिए कि वह है, और अपने खोजने वालों को प्रतिफल देता है” (इब्रानियों 11∶6)। क्योंकि परम आनन्द, मोक्ष, मुक्ति, उद्धार तभी मिलता है, जब एक भक्त सतगुरु की वाणी को सुनता है, “इसलिए विश्वास सुनने से, और सुनना मसीह की वाणी से आता है” (रोमियों 10:17)। यह हमारी पूरी चर्चा को संक्षेप में गुरु ग्रंथ के शब्दों में ही प्रस्तुत करने में सहायता करता है, “वह [एक साधक] परमेश्वर पर अपना ध्यान केंद्रित करता है, और केवल एक परमेश्वर की सेवा करता है, जिसे गुरु के द्वारा जाना जाता है” (गुरु ग्रंथ. पृष्ठ. 885) [13] और, “सतिगुरु (नाम की दाति) देने वाला है। गुरु ठण्ड का श्रोत है। गुरु (ही) त्रिलोकी में प्रकाश करने वाला है। हे नानक! कभी ना समाप्त होने वाला (नाम रूपी) पदार्थ (गुरु से मिलता है)। जिसका मन गुरु में मग्न हो जाए, वह सुखी हो जाता है” (गुरु ग्रंथ, पृष्ठ. 137) [14]  और वह स्वयं सतगुरु यीशु मसीह


[1] सबदु गुरू सुरति धुनि चेला ॥

[2] गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

(शाब्दिक अर्थः गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु देव महेश्वर शिव हैं, गुरु ही वस्तुतः परब्रह्म परमेश्वर हैं; ऐसे श्रीगुरु के प्रति मेरा नमन है । गुरु ज्ञान-दाता अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति होता है । उक्त श्लोक में यह भाव व्यक्त हैं कि परमात्मा का ज्ञान पाने, उस तक पहुंचने, का मार्ग गुरु ही होते हैं)।

गुरू गोविन्द दोउ खड़े, काके लागूं पाय । बलिहारी गुरू आपणे, गोविन्द दियो बताय ।।

कबीर कहते हैं की गुरु का स्थान ईश्वर से भी ऊपर है। यदि दोनों एक साथ खड़े हो तो किसे पहले प्रणाम करना चाहिए। किन्तु गुरु की शिक्षा के कारण ही ईश्वर के दर्शन हुए हैं।

[3] ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

[4] बिनु सतिगुर किनै न पाइओ बिनु सतिगुर किनै न पाइआ ॥         

[5] गुर का सबदु अंम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥

[6] हरि हमरा हम हरि के दासे नानक सबदु गुरू सचु दीना जीउ ॥४॥१४॥२१॥

[7] सतिगुर मिलिऐ सदा मुकतु है जिनि विचहु मोहु चुकाइआ ॥

[8] सतिगुर की जिस नो मति आवै सो सतिगुर माहि समाना ॥

[9] सबदु गुर पीरा गहिर गंभीरा बिनु सबदै जगु बउरानं ॥

[10] नानक दुखीआ सभु संसारु ॥

[11] धुर की बाणी आई ॥ तिनि सगली चिंत मिटाई ॥

[12] एकु पिता एकस के हम बारिक तू मेरा गुर हाई ॥

[13] एका सुरति एका ही सेवा एको गुर ते जापै ॥१॥

[14] गुरु दाता गुरु हिवै घरु गुरु दीपकु तिह लोइ ॥ अमर पदारथु नानका मनि मानिऐ सुखु होइ ॥१॥

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